अनुशासन, कड़ी नियंत्रण व्यवस्था ने रूस को सैन्य महाशक्ति के रूप में स्थापित किया
नई दिल्ली। रूस के पास शक्तिशाली सैन्य ताकत है। इसके पीछे सिर्फ इसका विशाल हथियार भंडार, उन्नत मिसाइल तकनीक या न्यूक्लियर क्षमता ही कारण नहीं है, बल्कि एक सख्त, संगठित और रणनीतिक कमांड-स्ट्रक्चर है, जिसे ‘रूसी वॉर मशीन’ कहा जाता है। रूस की सेना राजनीतिक नेतृत्व, सैन्य प्रशासन, रणनीतिक केंद्र और फील्ड फोर्सेज के बीच गहरे समन्वय पर काम करती है। अनुशासन और कड़ी नियंत्रण व्यवस्था ने रूस को दशकों से सैन्य महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रूस में सेना का सबसे बड़ा नियंत्रण राष्ट्रपति के हाथों में होता है, जिन्हें संविधान के तहत सशस्त्र बलों का सुप्रीम कमांडर घोषित किया गया है। युद्ध की घोषणा, रोकने का निर्णय, सैन्य नीति, परमाणु हथियारों के प्रयोग और सर्वोच्च स्तर की नियुक्तियों का अधिकार भी राष्ट्रपति के पास होता है। यही कारण है कि जब भी कोई बड़ा सैन्य फैसला होता है, अंतिम आदेश क्रेमलिन से आता है।
रूस का रक्षा मंत्रालय पूरी सैन्य प्रशासनिक मशीनरी का संचालन करता है जिसमें रक्षा बजट, सैन्य प्रशिक्षण, हथियारों और उपकरणों की खरीद, लॉजिस्टिक सपोर्ट और डिफेंस इंडस्ट्री का समन्वय शामिल है। रक्षा मंत्री राष्ट्रपति के निर्देशों पर काम करते हैं और राजनीतिक प्रशासन और सैन्य नेतृत्व के बीच पुल का काम करते हैं। रूसी सैन्य रणनीति का वास्तविक दिमाग जनरल स्टाफ है, जिसे सेना का ब्रेन सेंटर कहा जाता है। यहीं युद्ध योजनाएं बनती हैं, तैनाती के फैसले लिए जाते हैं और सभी सैन्य अभियानों का निर्देशन होता है। इसके प्रमुख यानी चीफ ऑफ द जनरल स्टाफ रूस के सर्वोच्च यूनिफॉर्मधारी अधिकारी होते हैं, जो सीधे राष्ट्रपति को सलाह दे सकते हैं और सभी सैन्य अभियानों का नियंत्रण रखते हैं।
रूसी सेना चार मुख्य शाखाओं में बंटी होती है ग्राउंड फोर्स, एयर एंड स्पेस फोर्सेज, नेवी और स्ट्रैटेजिक मिसाइल फोर्सेज। प्रत्येक शाखा का अपना कमांडर होता है, जो जनरल स्टाफ और रक्षा मंत्रालय दोनों को रिपोर्ट करता है। इसके अलावा रूस की स्पेशल ऑप्स यूनिट्स और खुफिया एजेंसियां युद्ध रणनीति और गोपनीय मिशनों की रीढ़ मानी जाती हैं। रूस की सैन्य शक्ति का असली आधार उसकी अनुशासन और प्रबंधन क्षमता है, जहां एक ही आदेश श्रृंखला पूरी सेना को एकसाथ संचालित कर सकती है।

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