वक्त से पहले चुनाव की खबरें, जनगणना के आंकड़ों ने बढ़ाया दबाव
नई दिल्ली / लखनऊ: उत्तर प्रदेश समेत अगले वर्ष (2027) की शुरुआत में विधानसभा चुनाव वाले अन्य राज्यों में चुनाव तय समय से पहले कराए जा सकते हैं। इस संभावना को लेकर देश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट बेहद तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, देश में आगामी जनगणना (Census) और उससे जुड़ी बेहद जटिल प्रशासनिक तैयारियों के कारण सरकारी मशीनरी पर पड़ने वाले भारी बोझ को देखते हुए केंद्र और चुनाव आयोग स्तर पर विभिन्न विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में भी चुनावी कार्यक्रमों और जनगणना संबंधी गतिविधियों के बीच संभावित टकराव को टालने के लिए प्रशासनिक स्तर पर तालमेल बिठाने की चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि, इस विषय पर अभी तक चुनाव आयोग या केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
क्यों समय से पहले चुनाव करा सकती है सरकार?
प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि चुनाव और जनगणना दोनों ही ऐसी प्रक्रियाएं हैं जिनमें देश की पूरी प्रशासनिक मशीनरी झोंकनी पड़ती है। यदि दोनों कार्यक्रम एक ही समय पर होते हैं, तो इसके कई बड़े नुकसान हो सकते हैं:
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अधिकारियों और कर्मचारियों पर दोहरा दबाव: जिलाधिकारी (DM) स्तर से लेकर ब्लॉक और बूथ स्तर तक के सभी सरकारी कर्मचारी (जैसे शिक्षक, पटवारी आदि) चुनाव और जनगणना दोनों ड्यूटी में रीढ़ की हड्डी होते हैं। दोनों काम साथ होने से व्यवस्था चरमरा सकती है।
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संसाधनों की कमी: मतदान केंद्रों के प्रबंधन, सुरक्षा बलों की तैनाती और गाड़ियों की व्यवस्था के लिए जिला प्रशासन को बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने पड़ते हैं। जनगणना के व्यापक सर्वे के लिए भी ठीक इसी स्तर के संसाधनों की जरूरत होती है।
भविष्य के परिसीमन (Delimitation) पर भी टिकी नजरें
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस जल्दबाजी के पीछे एक बड़ा कारण आगामी जनगणना के बाद होने वाला लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन भी हो सकता है। हालांकि परिसीमन एक लंबी और अलग कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन जनगणना के आंकड़े आते ही इस पर काम शुरू हो जाएगा। सरकार चाहती है कि जनगणना का काम शुरू होने से पहले ही महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव निपटा लिए जाएं, ताकि बाद में पूरा ध्यान जनगणना और परिसीमन पर केंद्रित किया जा सके।
चर्चाओं से राजनीतिक दलों में मची हलचल
भले ही समय से पहले चुनाव को लेकर अभी कोई फाइनल मुहर न लगी हो, लेकिन इन चर्चाओं ने राजनीतिक दलों को पूरी तरह अलर्ट मोड पर डाल दिया है:
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भाजपा की रणनीति: भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहले से ही संगठनात्मक स्तर पर देशव्यापी जनसंपर्क और बूथ जीतो अभियानों के जरिए खुद को चुनावी मोड में डाल रखा है।
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विपक्ष की तैयारी: समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दल भी इस संभावित चुनावी स्थिति को भांपते हुए अपनी रणनीतियों को धार देने और जमीनी गठबंधन मजबूत करने में जुट गए हैं।
क्या कहता है नियम? नियमों के मुताबिक, चुनाव आयोग किसी भी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से अधिकतम 6 महीने पहले तक चुनाव करा सकता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल मई 2027 में समाप्त होना है, ऐसे में अगर सरकार और आयोग में सहमति बनती है, तो 2026 के अंत तक भी चुनाव की तारीखों का ऐलान संभव हो सकता है। फिलहाल, चुनाव आयोग विभिन्न राज्यों की प्रशासनिक आवश्यकताओं और सुरक्षा व्यवस्था का बारीकी से अध्ययन कर रहा है।

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