ईरान-इजरायल संघर्ष से कच्चा तेल रिकॉर्ड हाई पर, आम आदमी की जेब पर असर
मिडल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार को झटका दिया है. शुक्रवार को तेल की कीमतों में जोरदार उछाल देखा गया, जब इज़राइल ने दावा किया कि उसने ईरान पर हमला किया है. इस खबर के बाद ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई (WTI) दोनों बेंचमार्क कच्चे तेल की कीमतें 5% से ज्यादा बढ़ गईं और यह फरवरी के बाद पहली बार दो महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं.
तेल कंपनियों के स्टॉक्स में तेजी
विश्लेषकों का कहना है कि यह उछाल पूरी तरह भू-राजनीतिक जोखिमों से प्रेरित है. मिडिल ईस्ट पहले से ही ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र रहा है और इज़राइल-ईरान के बीच की यह ताजा झड़प वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ा रही है कि कहीं यह तनाव बड़े स्तर पर युद्ध में न बदल जाए, जिससे तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है. वहीं, इस तनाव के चलते और क्रूड ऑयल की कीमतों में उबाल के चलतेशेयर मार्केट में ONGC और Oil India के शेयरों में 4% तक की तेजी आई.
ऐसा कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से हुआ. जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी कंपनियों को तेल बेचकर होने वाली कमाई बेहतर होने की उम्मीद बढ़ जाती है. ONGC का शेयर आज ₹251.05 पर खुला और सुबह में ही ₹255.15 के उच्चस्तर तक पहुंच गया.
क्या हैं इसके असर?
भारत जैसे तेल आयातक देशों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं. इससे ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स पर महंगाई का दबाव और तेज़ हो सकता है.
इसके साथ ही रुपये पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है, क्योंकि अधिक डॉलर में तेल आयात करने से ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है. निवेशकों के लिए भी यह संकेत है कि भू-राजनीतिक घटनाओं का बाजार पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है, खासकर तेल और गैस क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों पर.
क्या आगे और बढ़ेगी कीमत?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान और इज़राइल के बीच तनाव और बढ़ता है या अगर क्षेत्र के अन्य देश इसमें खिंचते हैं, तो तेल की कीमतें और ऊंची जा सकती हैं. कुछ अनुमान बता रहे हैं कि अगर ईरान की तेल आपूर्ति पर असर पड़ा, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार भी जा सकती हैं.
फिलहाल, निवेशकों और नीति निर्माताओं की निगाहें इस क्षेत्र की स्थिति पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह सिर्फ तेल की कीमतों ही नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित कर सकती है.

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