धन धान्य योजना के तहत विषमुक्त खेती की ओर कदम
रायपुर : छत्तीसगढ़ शासन एवं जिला प्रशासन दंतेवाड़ा द्वारा संचालित धन धान्य योजना के अंतर्गत जिले को जैविक और विषमुक्त खेती की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी पहल का सकारात्मक परिणाम ग्राम हितावर (विकासखंड कुआकोंडा) के प्रगतिशील किसान श्री संजय के रूप में सामने आया है, जिन्होंने रासायनिक खेती को छोड़कर पूरी तरह जैविक तरीके से मक्का उत्पादन कर क्षेत्र के किसानों के सामने एक प्रेरक सफलता कहानी प्रस्तुत की है।
जैविक खेती अपनाने का निर्णय
धन धान्य योजना (Pradhan Mantri Dhan-Dhaanya Krishi Yojana) भारत सरकार की एक नई कृषि योजना है, जिसका लक्ष्य देश के 100 सबसे पिछड़े जिलों (कम उत्पादकता वाले) को चुनकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है, जिसमें 11 मंत्रालयों की 36 योजनाओं को एकीकृत किया जाएगा, ताकि सिंचाई, फसल विविधीकरण, ऋण, पशुपालन और प्राकृतिक खेती पर ध्यान केंद्रित करके किसानों की आय और देश के कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सके. यह योजना किसानों को सशक्त बनाने, कृषि में मूल्यवर्धन करने और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बनाई गई है.
विभागीय मार्गदर्शन और जैविक तकनीक का उपयोग
मिट्टी की गिरती उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता से परेशान संजय ने कृषि विभाग से मार्गदर्शन प्राप्त किया और इस वर्ष पूरी तरह जैविक विधि से खेती करने का निर्णय लिया। कृषि विभाग के मैदानी अमले ने उन्हें विषमुक्त खेती के लाभों, जैविक संसाधनों के महत्व और मिट्टी की सेहत सुधारने के उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। मार्गदर्शन के अनुसार संजय ने खेत की तैयारी के लिए गोबर की खाद और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग,बीज उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा और बीजामृत और फसल पोषण हेतु जीवामृत एवं घनजीवामृत जैसे जैविक घोलों का उपयोग किया। रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बंद करने के बावजूद मक्का की फसल में किसी प्रकार की पोषक कमी नहीं आई। बल्कि फसल पहले से अधिक हरी-भरी, स्वस्थ और आकर्षक दिखी।
कम लागत और बेहतर उपज-डबल फायदा
जैविक खेती से संजय की लागत में उल्लेखनीय कमी आई है क्योंकि उन्हें महंगे रासायनिक उर्वरक खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वर्तमान में उनके खेत में मक्का की बालियाँ मजबूत हैं।दानों का भराव उत्कृष्ट है और जैविक उपज होने से उन्हें बाजार में बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद है। संजय बताते हैं कि रासायनिक खादों से पहले खर्च बढ़ जाता था और जमीन कठोर हो रही थी, लेकिन इस वर्ष जैविक खेती से फसल भी अच्छी मिली और लागत भी घटी। अब वे अन्य फसलों में भी जैविक पद्धति अपनाने का मन बना रहे हैं।
क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणादायक मिसाल
किसान संजय की पहल ने यह साबित कर दिया है कि सही मार्गदर्शन, मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से जैविक खेती पूरी तरह सफल हो सकती है। उनकी सफलता कुआकोंडा क्षेत्र में जैविक और विषमुक्त खेती के विस्तार का एक महत्वपूर्ण कदम है। धन धान्य योजना के उद्देश्य के अनुरूप यह सफलता कहानी दंतेवाड़ा जिले में प्राकृतिक कृषि को नई दिशा दे रही है और अन्य किसानों को भी प्रेरित कर रही है।

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