आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था में ऑनलाइन खरीदारी जितनी सहज और सुलभ हुई है, उधारी का दायरा भी उतनी ही तेजी से फैल रहा है। उपभोक्ता बाजार में 'बाय नाउ, पे लेटर' (बीएनपीएल) सुविधा का चलन तेजी से बढ़ा है, जिसकी गिरफ्त में मुख्य रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोग आ रहे हैं। चिंताजनक स्थिति यह है कि अब लोग केवल महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स या कपड़ों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि दूध, राशन और रोजमर्रा के किराना सामान जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी किस्तों पर निर्भर होने लगे हैं।

बीएनपीएल की कार्यप्रणाली और ई-कॉमर्स का गणित

पारंपरिक ईएमआई व्यवस्था का यह डिजिटल संस्करण ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर एक क्लिक में उपलब्ध हो जाता है। बिना किसी जटिल क्रेडिट जांच के खरीदार के कुल बिल को तीन से चार छोटी किस्तों में विभाजित कर दिया जाता है। ऑनलाइन रिटेलर्स और प्लेटफॉर्म्स इसे इसलिए बढ़ावा देते हैं क्योंकि इससे उनकी कुल बिक्री और औसत ऑर्डर मूल्य में भारी इजाफा होता है। शुरुआती स्तर पर इसे बिना किसी अतिरिक्त ब्याज वाली मुफ्त सुविधा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे उपभोक्ता आसानी से आकर्षित हो जाते हैं।

छोटी किस्तों का भ्रम और बढ़ता वित्तीय बोझ

यह सुविधा धीरे-धीरे उपयोगकर्ताओं को अनजाने कर्ज के भंवर में फंसा देती है। आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश उपभोक्ता एक ही समय में कई अलग-अलग मंचों से बीएनपीएल लोन लेकर चल रहे हैं। तीन सौ से पांच सौ रुपये जैसी मामूली दिखने वाली कई किस्तें जुड़कर महीने के पूरे घरेलू बजट को असंतुलित कर देती हैं। इसके अलावा, शून्य ब्याज का दावा केवल समय पर भुगतान तक ही सीमित रहता है; किस्त चूकते ही भारी विलंब शुल्क, बैंक ओवरड्राफ्ट चार्ज और लंबी अवधि में तीस फीसदी से अधिक का वार्षिक ब्याज वसूल लिया जाता है। समय पर भुगतान न कर पाने के कारण डिफॉल्ट की दर लगातार बढ़ रही है और यह व्यवस्था गैर-जरूरी खर्च को बढ़ावा दे रही है।

सतर्कता, वित्तीय अनुशासन और बरती जाने वाली सावधानियां

इस डिजिटल कर्ज से सुरक्षित रहने के लिए उपभोक्ताओं को प्रत्येक बीएनपीएल विकल्प को एक वास्तविक कर्ज मानकर चलना चाहिए, जो सीधे तौर पर उनकी भविष्य की कमाई पर निर्भर है। सभी सक्रिय किस्तों और उनकी भुगतान तिथियों का स्पष्ट ब्योरा रखना तथा बैंक खाते में पर्याप्त राशि बनाए रखना जरूरी है ताकि पेनाल्टी से बचा जा सके। साथ ही, घरेलू राशन या रोजमर्रा के खान-पान के लिए किस्तों का सहारा लेने से पूरी तरह बचना चाहिए, क्योंकि यह गंभीर आर्थिक संकट का संकेत है। नियम और शर्तों को पूरी तरह समझे बिना इस विकल्प का इस्तेमाल करने और सैलरी आने पर सब संभल जाने जैसी लापरवाही भरी सोच से बचना ही वित्तीय समझदारी है।